MTP Act 1971 : सुप्रीम कोर्ट द्वारा गर्भपात कानून पर ‘सुप्रीम निर्णय’

अभी हाल में ही अमेरिका में गर्भपात के अधिकार को पलटा है और हम अब उसी अमेरिका के ख़त्म कानूनों के तरफ बढ़ रहे है। इसमें तनिक भी संशय नहीं होना चाहिए कि परिवर्तित सामाजिक व्यवस्था में हर स्त्री का अधिकार है कि वह अपनी गर्भावस्था के संबंध में स्वयं निर्णय ले। किन्तु भारत के…

MTP Act 1971 : सुप्रीम कोर्ट द्वारा गर्भपात कानून पर ‘सुप्रीम निर्णय’

अभी हाल में ही अमेरिका में गर्भपात के अधिकार को पलटा है और हम अब उसी अमेरिका के ख़त्म कानूनों के तरफ बढ़ रहे है।

इसमें तनिक भी संशय नहीं होना चाहिए कि परिवर्तित सामाजिक व्यवस्था में हर स्त्री का अधिकार है कि वह अपनी गर्भावस्था के संबंध में स्वयं निर्णय ले। किन्तु भारत के सर्वोच्च अदालत का यह कहना कि इच्छा विरुद्ध अगर कोई विवाहित महिला गर्भवती होती है, तो उसके पति पर दुष्कर्म का आपराधिक मामला दर्ज किया जा सकता है। इस प्रकार का विषय हमारी समाजिक संस्कृति पर अत्यंत ही गंभीर परिणाम डालती है जो कि लिव इन रिलेशनशिप आदि के सन्दर्भ में हम देख रहे है।


सुप्रीम कोर्ट ने बीते दिनों विवाहित-अविवाहित-एकल सभी वर्ग की महिलाओं को गर्भपात कानून (मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट 1971) MTP Act 1971 के दायरे में लाने का फैसला सुनाया।


हकीकतन में इस निर्णय का हमारे समाज पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेगा।


उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय में स्पष्ट कर दिया कि महिला की देह पर सिर्फ और सिर्फ उसका ही अधिकार है, यदि वह गर्भधारण नहीं करना चाहती, तो उसके लिए किसी भी प्रकार का दबाव नहीं बनाया जा सकता।


सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि इच्छा विरुद्ध अगर कोई विवाहित महिला गर्भवती होती है, तो उसके पति पर दुष्कर्म का आपराधिक मामला दर्ज किया जा सकता है।


इस निर्णय के इर्द-गिर्द दो प्रश्न घूमते हैं कि-

क्या स्त्री के लिए गर्भावस्था पूर्णता व्यक्तिगत मामला है और

दूसरा, अनचाही गर्भावस्था और उससे जन्म लिए बच्चे पर क्या इसका कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ता है?


एक महत्वपूर्ण तर्क गर्भावस्था को निजी निर्णय न ठहराने के संबंध में दिया जाता है कि गर्भधारण करने की विशिष्ट क्षमता के कारण स्त्री की देह पर उसी का अधिकार नहीं रह जाता तथा वैवाहिक संबंध में वह बच्चे को जन्म देने से इनकार नहीं कर सकती।


MTP रूल्स के तहत 20 हफ्ते तक के गर्भ का अबॉर्शन करवाया जा सकता है। पहले यह अनुमति 12 हफ्ते तक के गर्भ के लिए थी लेकिन 2021 में नियमों में संशोधन हुआ।


अभी हाल में ही अमेरिका में गर्भपात के अधिकार को पलटा है और हम अब उसी अमेरिका के ख़त्म कानूनों के तरफ बढ़ रहे है। यही तर्क हाल ही में अमेरिका में पचास वर्ष पूर्व दिए गए गर्भपात के अधिकार को पलटने का महत्वपूर्ण आधार भी बना।


अब बात उस प्रश्न के उत्तर को खोजने की जो अनचाहे बच्चों से जुड़ी है। यहां विश्लेषण का केंद्र बिंदु यह है कि प्रश्न चाहे एकल मांओं का हो या फिर विवाहित का कोई भी स्त्री उस स्थिति में बच्चे को जन्म नहीं देना चाहेगी, जब तक उसके लिए परिस्थितियां मनोनुकूल न हों विशेषकर एकल मांओं के लिए, क्योंकि किसी भी बच्चे के पालन-पोषण में माता-पिता दोनों का होना उसके सशक्त और उज्ज्वल भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है।


भारत जैसे देश में इसका प्रत्यक्ष संबंध सामाजिक स्वीकृति से भी है। अविवाहित स्त्री के लिए बच्चे को जन्म देना जितना चुनौतीपूर्ण है, उससे अधिक उस बच्चे के लिए है। सामाजिक विचारधारा के तमाम उदारवादी दृष्टिकोणों के बीच ऐसे बच्चों के लिए संकीर्ण मानसिकताएं उनके कोमल हृदय पर प्रहार करती हैं। कई शोध इस सत्य पर निरंतर प्रकाश डालते आए हैं कि अवांछित बच्चे एवं उन को जन्म देने वाली मांओं का जीवन संघर्षमय एवं अवसाद ग्रस्त होता है।


मई, 2016 में प्रकाशित बॉर्न अनवांटेड, थर्टी फाइव ईयर्स लेटर: द प्रैग स्टडी उन बच्चों की आर्थिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक स्थितियों का गहन विश्लेषण हैं, जो कि अपनी मां के जीवन में अवांछित थे। 1960 के दशक में उन 220 बच्चों को अध्ययन का केंद्र बनाया गया, जिनकी माताएं उन्हें जन्म नहीं देना चाहती थीं। चूंकि उन्हें किन्हीं कारणों के चलते गर्भपात के अधिकार से वंचित किया गया, इसलिए उन्होंने बच्चों को जन्म दिया।


वहीं अध्ययन में अन्य वे 220 बच्चे भी सम्मिलित किए गए जिनकी माताएं उन्हें जन्म देना चाहती थीं। शोधकर्ताओं ने पाया कि अवांछित बच्चों की शैक्षणिक उपलब्धि सामान्य से बहुत कम रही।


यही नहीं उनके जीवन में वांछित बच्चों की अपेक्षाकृत संघर्ष अधिक था और वे 35 वर्ष की आयु तक अपने समान आयु वर्ग के लोगों की तुलना में मानसिक रोगी होने की संभावना अधिक रखते थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूएनएफपीए के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया भर के कुल गर्भपातों में से 45 फीसदी असुरक्षित होते हैं और इन प्रक्रियाओं को अपनाने वाली महिलाओं की मौत की आशंका बहुत अधिक बढ़ जाती है।


इसमें लेशमात्र का भी संशय नहीं कि परिवर्तित सामाजिक व्यवस्था में हर स्त्री का अधिकार है कि वह अपनी गर्भावस्था के संबंध में स्वयं निर्णय ले। परंतु शीर्ष अदालत का यह कहना कि इच्छा विरुद्ध अगर कोई विवाहित महिला गर्भवती होती है, तो उसके पति पर दुष्कर्म का आपराधिक मामला दर्ज किया जा सकता है, यह व्यवस्था भविष्य में उन पुरुषों के लिए घातक सिद्ध हो सकती है, जहां पति-पत्नी का मनमुटाव मर्यादा की सीमा पार करने के स्तर पर हो।


कहीं ऐसा न हो कि यह कानून भी उस पंक्ति में सम्मिलित हो जाए, जहां पूर्व में ही दहेज कानून, घरेलू हिंसा कानून और लिव इन रिलेशनशिप के दुरुपयोग के मामले खड़े हैं।


अनेका अनेक न्यायालय के निर्णयों कि समीक्षा करने से यह तथ्य पर प्रकाश आता है कि वैवाहिक झगड़ों के मध्य ‘अहम’ ही सर्वोच्च स्थान पाता है, चाहे उसके लिए बच्चों का भी भविष्य अंधकार में क्यों न हो जाए।

EDITED BY

AMITESH KUMAR MRITYUNJAY

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