सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ज़मीन अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत ऐसी अपील, जो मुआवज़े के तय होने या उसे बढ़ाने को चुनौती दिए बिना सिर्फ़ कानूनी फ़ायदों (Statutory Benefits) को पाने तक सीमित हो, उस पर कोर्ट फ़ीस अधिनियम, 1870 की धारा 8 के तहत डिक्री की गई राशि पर ‘एड वैलोरम’ (मूल्य-आधारित) कोर्ट फ़ीस लगेगी।
जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने कहा,
“धारा 54 के तहत ऐसी किसी भी चीज़ (कानूनी फ़ायदों) को कम करने या हटाने की अपील, मुआवज़े से जुड़े रेफरेंस कोर्ट के फ़ैसले (डिक्री) के ख़िलाफ़ अपील है। इसलिए इस पर कोर्ट फ़ीस अधिनियम की धारा 8 के तहत ‘एड वैलोरम’ कोर्ट फ़ीस लगती है। इसलिए हमें हाईकोर्ट के इस नज़रिए में कोई गलती नहीं लगती कि अपील के मेमोरेंडम के साथ ‘एड वैलोरम’ कोर्ट फ़ीस जमा की जानी चाहिए थी और तय कोर्ट फ़ीस का भुगतान कानून के ख़िलाफ़ है। इसलिए हाईकोर्ट के फ़ैसले में दखल देने की कोई ज़रूरत नहीं है।”
बेंच ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के उस फ़ैसले को सही ठहराया, जिसमें अपीलकर्ता को ज़मीन अधिग्रहण मुआवज़े की डिक्री की गई राशि में कानूनी फ़ायदों को हटाने के लिए दायर अपील में ‘एड वैलोरम’ कोर्ट फ़ीस देने का आदेश दिया गया।
यह मामला टिहरी बांध से विस्थापित लोगों के पुनर्वास के लिए ज़मीन अधिग्रहण मुआवज़ा देने से जुड़ा है। मुआवज़ा तय करने और उसे बढ़ाने की मांग के साथ-साथ विस्थापित लोगों ने अधिनियम के तहत कानूनी फ़ायदों का दावा करते हुए रेफरेंस कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
रेफरेंस कोर्ट ने मुआवज़ा बढ़ाने का दावा तो खारिज किया, लेकिन कानूनी फ़ायदे मंज़ूर कर लिए, जैसे कि तय मुआवज़े पर 12% सालाना की दर से अतिरिक्त राशि, 30% की दर से सोलेशियम (मुआवज़े के साथ मिलने वाली अतिरिक्त राशि), और तय दरों पर कानूनी ब्याज।
प्रतिवादी-विस्थापितों को कानूनी फ़ायदे दिए जाने के ख़िलाफ़ अपीलकर्ता ने अधिनियम की धारा 54 के तहत हाई कोर्ट में पहली अपील दायर की।
अपील की कीमत 2,34,03,602.05 रुपये आंकी गई। हालांकि, अपीलकर्ता ने 10 रुपये की तय कोर्ट फ़ीस का भुगतान किया, यह मानते हुए कि अपील में मुआवज़ा तय करने को कोई चुनौती नहीं दी गई। हाईकोर्ट ने तय कोर्ट फ़ीस के भुगतान को गलत मानते हुए और उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए अपील करने वाले को आदेश दिया कि वह अपील में चुनौती दी गई ₹2,34,03,602.05 की डिक्री वाली राशि पर ‘एड वैलोरम’ (मूल्य-आधारित) कोर्ट फ़ीस का भुगतान दो हफ़्ते के भीतर करे। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई।
हाईकोर्ट का फ़ैसला सही ठहराते हुए जस्टिस महादेवन के लिखे फ़ैसले में ‘इंदौर डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम तारक सिंह और अन्य, (1995) Supp (3) SCC 25’ का हवाला दिया गया। इस मामले में यह तय किया गया था कि रेफरेंस कोर्ट के अवॉर्ड को चुनौती देने वाली धारा 54 के तहत अपील पर ‘कोर्ट फ़ीस एक्ट’ की धारा 8 के तहत ‘एड वैलोरम’ कोर्ट फ़ीस लागू होती है।
कोर्ट ने कहा कि अपील करने वाला अवॉर्ड की गई राशि और उसके द्वारा दावा की गई राशि के अंतर पर ‘एड वैलोरम’ कोर्ट फ़ीस देने का हकदार होगा। साथ ही कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज किया कि कानूनी लाभ मुआवज़े की डिक्री वाली राशि का एक अलग हिस्सा होते हैं।
