SHIVANI BARMAN – REPORTER
नई दिल्ली, 2 अगस्त। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुइयां ने न्यायपालिका में अधिक पारदर्शिता की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि एक मजबूत संवैधानिक लोकतंत्र के लिए न्यायिक व्यवस्था का खुला और जवाबदेह होना अत्यंत आवश्यक है। उनका कहना है कि जिस न्यायपालिका पर जनता का विश्वास अधिक होता है, वह सरकार की जवाबदेही तय करने और कानून के शासन को प्रभावी ढंग से लागू करने में अधिक सक्षम होती है।
जस्टिस भुइयां ने यह बात “ज्यूडिशियल ट्रांसपेरेंसी इंडेक्स: असेसिंग डिस्क्लोजर ऑफ इन्फॉर्मेशन बाय द सुप्रीम कोर्ट एंड द हाई कोर्ट्स” रिपोर्ट के विमोचन कार्यक्रम में कही। यह रिपोर्ट विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी (Vidhi Centre for Legal Policy) द्वारा तैयार की गई है।
उन्होंने कहा कि न्यायपालिका में पारदर्शिता से आम नागरिकों को न्यायिक प्रक्रिया की बेहतर समझ मिलती है और न्यायालयों की कार्यप्रणाली पर सार्वजनिक निगरानी भी संभव होती है। इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और कार्यकुशलता मजबूत होती है।
पारदर्शिता की दिशा में प्रगति हुई, लेकिन अभी लंबा सफर बाकी
जस्टिस भुइयां ने स्वीकार किया कि भारतीय न्यायपालिका ने पिछले कुछ वर्षों में पारदर्शिता की दिशा में उल्लेखनीय कदम उठाए हैं, लेकिन अभी भी कई सुधार किए जाने बाकी हैं। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को और अधिक खुला तथा जवाबदेह बनाने की आवश्यकता है।
‘सीलबंद लिफाफा’ प्रक्रिया पर जताई चिंता
कार्यक्रम के दौरान आयोजित चर्चा में जस्टिस भुइयां ने अदालतों में अपनाई जाने वाली ‘सीलबंद लिफाफा’ (Sealed Cover) प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए।
उन्होंने कहा कि अक्सर राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर किसी मामले की जानकारी एक पक्ष से छिपा ली जाती है। ऐसे में यह विचार करना जरूरी है कि क्या यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14 में दिए गए समानता के अधिकार के अनुरूप है।
उन्होंने कहा कि यदि एक पक्ष को जानकारी उपलब्ध हो और दूसरे पक्ष को नहीं, तो दोनों को समान अवसर नहीं मिल पाता। यह न्याय के मूल सिद्धांतों और निष्पक्ष सुनवाई की भावना के विपरीत प्रतीत होता है।
जस्टिस भुइयां ने कहा कि अब समय आ गया है कि न्यायपालिका इस प्रक्रिया की दोबारा समीक्षा करे और यह तय करे कि क्या खुली न्याय प्रणाली में इस व्यवस्था की अब भी कोई आवश्यकता है।
लाइव स्ट्रीमिंग को बताया पारदर्शिता की बड़ी पहल
जस्टिस भुइयां ने कहा कि पिछले दशक में न्यायपालिका में पारदर्शिता की दिशा में सबसे बड़ा कदम अदालतों की कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग रहा है।
उन्होंने दार्शनिक प्लेटो और विधिवेत्ता जेरेमी बेंथम के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायिक कार्यवाही जनता के लिए खुली होना लोकतंत्र की मजबूती का महत्वपूर्ण आधार है।
उन्होंने स्वप्निल त्रिपाठी मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत न्याय तक पहुंच और सूचना के अधिकार के आधार पर अदालत की कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग को अनुमति दी थी।
भ्रामक वीडियो क्लिप पर भी जताई चिंता
जस्टिस भुइयां ने कहा कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा लाइव स्ट्रीम की गई कार्यवाही की अनधिकृत क्लिपिंग, एडिटिंग और भ्रामक प्रसार पर लगाए गए प्रतिबंध उचित हैं।
उन्होंने कहा कि कई बार सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों की मौखिक टिप्पणियों के छोटे-छोटे हिस्सों को संदर्भ से हटाकर सनसनीखेज शीर्षकों के साथ सोशल मीडिया पर प्रसारित किया जाता है, जिससे न्यायाधीशों, अधिवक्ताओं और पक्षकारों की प्रतिष्ठा प्रभावित होती है तथा जनता के सामने वास्तविक कार्यवाही की गलत तस्वीर प्रस्तुत होती है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह प्रतिबंध लाइव स्ट्रीमिंग का विरोध नहीं है, बल्कि पारदर्शिता और भ्रामक प्रचार के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास है।
जनता का विश्वास सबसे बड़ी ताकत
जस्टिस भुइयां ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश डॉ. डी.वाई. चंद्रचूड़ की उस राय का भी उल्लेख किया जिसमें कहा गया था कि नागरिकों को अदालत की कार्यवाही जानने और समझने का अधिकार है।
उन्होंने कहा कि न्यायपालिका में जनता का विश्वास बनाए रखना कानून के शासन और लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थिरता के लिए अत्यंत आवश्यक है। जब नागरिक न्यायिक प्रक्रिया को खुलकर देख और समझ पाते हैं, तब न्याय व्यवस्था के प्रति उनका भरोसा और अधिक मजबूत होता है।
