ज़मानत के लिए आवेदन में हलफ़नामा ज़रूरी नहीं : इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा लॉक डाउन की अवधि के दौरान आवश्यक प्रकरणों की सुनवाई हेतु ई-फाइलिंग की प्रक्रिया को संशोधित किया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को जारी हुई एक अधिसूचना में संशोधन किया है जिसके अनुसार जमानत के लिए अब वक़ील नोटरी के हलफ़नामे की स्कैन कॉपी भी जमा कर सकने का अतिरिक्त विकल्प होगा।…

ज़मानत के लिए आवेदन में हलफ़नामा ज़रूरी नहीं : इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा लॉक डाउन की अवधि के दौरान आवश्यक प्रकरणों की सुनवाई हेतु ई-फाइलिंग की प्रक्रिया को संशोधित किया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को जारी हुई एक अधिसूचना में संशोधन किया है जिसके अनुसार जमानत के लिए अब वक़ील नोटरी के हलफ़नामे की स्कैन कॉपी भी जमा कर सकने का अतिरिक्त विकल्प होगा। पूर्व में हलफ़नामे की स्कैन की हुई कॉपी या ई-हलफ़नामा जमा करने का विकल्प था।

लॉक डाउन के मद्देनजर हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि लॉकडाउन के दौरान ज़मानत/अग्रिम ज़मानत के आवेदन के साथ हलफ़नामा/ई-हलफ़नामा/नोटरी के हलफ़नामे की स्कैन कॉपी भी जमा करना आवश्यक नही होगा। लेकिन लॉकडाउन के हटने के 15 दिनों के भीतर उचित हलफ़नामें की हार्ड कॉपी अदालत में दी जानी चाहिए। तथा वकीलों को गवाही देने वालों का आधार कार्ड, कार्डधारकों का पूरा विवरण भी देना होगा और यह घोषित करना होगा कि उक्त व्यक्ति द्वारा आवेदन में सही जानकारी दी जा रही है।

अदालत ने कहा –

 “ अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो इस मामले को स्वतः निरस्त कर दिया जाएगा और इस मामले में दिए गए आदेश अदालत के संदर्भ के बिना वापस हो जाएँगे।”

एचसीबीए ने अदालत से कहा

 एचसीबीए ने प्रक्रिया में हुए इस बदलाव के बारे में अदालत से कहा कि अगर किसी वकील के द्वारा प्रक्रिया के पालन में चूक हो जाती है तो, अदालत उस पर प्रतिकूल टिप्पणियां न करे। और इस प्रक्रिया में हुए व्यापक बदलाव को इसका कारण बताया क्योंकि वकीलों को इसे समझने और कार्य  में लाने में थोड़ा समय लग सकता हैं ।

ई – फाइलिंग के बारे में पैरा 17 को निलंबित किया गया

वकीलों द्वारा इस प्रक्रिया को लेकर होने वाली कठिनाईयो को देखते हुए हाईकोर्ट द्वारा ई-फाइलिंग के बारे में पैरा 17 को निलंबित कर दिया गया है । जिसमें यह उल्लेखित था कि अगर कोई वक़ील वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के निर्धारित दिन सुनवाई में भाग नहीं लेता है तो अदालत इस मामले का फ़ैसला  मेरिट के आधार पर एकपक्षीय रूप में कर सकती है।

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