रायपुर। राजधानी रायपुर के अंतरराज्यीय बस स्टैंड निर्माण से जुड़ा बहुचर्चित भूमि विवाद अब न्यायिक जांच के दायरे में आ गया है। दुधाधारी मठ ट्रस्ट द्वारा दायर याचिका पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
याचिका के अनुसार, वर्ष 2007-08 में अंतरराज्यीय बस स्टैंड के निर्माण के लिए दुधाधारी मठ ट्रस्ट ने लगभग 30 एकड़ भूमि सरकार को इस आश्वासन पर उपलब्ध कराई थी कि बदले में नवा रायपुर में वैकल्पिक भूमि तथा बस स्टैंड परिसर में बनने वाले व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स की आधी दुकानें ट्रस्ट को आवंटित की जाएंगी।
ट्रस्ट का कहना है कि सरकार की ओर से लिखित आश्वासन मिलने के बाद ही भूमि हस्तांतरित की गई थी, लेकिन लगभग दो दशक बीत जाने के बावजूद न तो वैकल्पिक भूमि का आवंटन हुआ और न ही समझौते की शर्तों का पूर्ण पालन किया गया।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में भूमि आवंटन की प्रक्रिया प्रारंभ हुई थी, किंतु वह अंतिम निर्णय तक नहीं पहुंच सकी। वर्तमान सरकार के समक्ष भी कई बार मामला उठाया गया, परंतु कोई ठोस समाधान नहीं निकलने पर ट्रस्ट को न्यायालय की शरण लेनी पड़ी।
दुधाधारी मठ ट्रस्ट ने दुकानों के आवंटन में भी अनियमितता का आरोप लगाया है। ट्रस्ट के अनुसार, समझौते के तहत 14 दुकानें दिए जाने का वादा किया गया था, जबकि वास्तविकता में केवल 7 मूल दुकानों को विभाजित कर 14 दर्शा दिया गया। बिजली कनेक्शन संबंधी अभिलेखों से भी इस तथ्य की पुष्टि होने का दावा याचिका में किया गया है।
अब इस मामले में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। आगामी सुनवाई में यह स्पष्ट होगा कि भूमि के बदले भूमि तथा अन्य आश्वासनों के संबंध में सरकार ने अपने दायित्वों का पालन किया है या नहीं।
अधिवक्ता वाणी की कानूनी दृष्टि: यदि किसी व्यक्ति, संस्था या ट्रस्ट से सार्वजनिक उद्देश्य के लिए भूमि ली जाती है और उसके बदले लिखित आश्वासन या समझौता किया जाता है, तो ऐसे आश्वासन का पालन विधिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। न्यायालय इस बात की भी जांच कर सकता है कि प्रशासनिक वादों और समझौतों का विधिसम्मत पालन हुआ या नहीं।
नोट: यह मामला वर्तमान में न्यायालय में विचाराधीन है। अंतिम निर्णय माननीय न्यायालय द्वारा पारित आदेश के आधार पर ही होगा।

