दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में मरीजों के इलाज के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर महंगी मेडिकल मशीनें खरीदी गईं, लेकिन इनमें से कई मशीनें सालों से धूल खा रही हैं। न मरीजों को इनका फायदा मिल रहा है और न ही इन पर खर्च हुए सरकारी पैसे का सही इस्तेमाल हो पा रहा है। अब इस मामले पर दिल्ली हाई कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है।हाई कोर्ट ने इसे जनता के पैसे की बर्बादी बताते हुए दिल्ली सरकार के सभी सरकारी अस्पतालों को ऐसी मशीनों की जांच कराने का आदेश दिया है, जो खरीदी तो गईं लेकिन इस्तेमाल नहीं हो रहीं। अदालत के सामने दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट की 15.42 करोड़ रुपये की PET साइक्लोट्रॉन मशीन का मामला आया था, जो अप्रैल 2022 से बंद पड़ी है। इसके बाद कोर्ट ने सभी अस्पतालों में ऐसी मशीनों का ऑडिट कराने का निर्देश दिया।
सभी अस्पतालों को ऑडिट का आदेश
हाई कोर्ट की विशेष पीठ ने कहा कि दिल्ली सरकार के सभी अस्पताल यह जांच करें कि कौन-कौन सी मशीनें खरीदी गईं, लेकिन उनका इस्तेमाल नहीं हो रहा है। हर अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट को इस संबंध में हलफनामा दाखिल करना होगा।
रिपोर्ट में क्या-क्या बताना होगा?
अदालत ने रिपोर्ट में ये जानकारी देने को कहा है:
कौन सी मशीन खरीदी गई है।
उसका क्या उपयोग है।
मशीन की कीमत और खरीद का साल।
मशीन इस्तेमाल हो रही है या नहीं।
अगर नहीं हो रही, तो उसका कारण क्या है।
15.42 करोड़ की मशीन सालों से बंद
अदालत के नियुक्त वकील अशोक अग्रवाल ने बताया कि PET Trace-10 मेडिकल साइक्लोट्रॉन मशीन 25 सितंबर 2017 को लगाई गई थी। इसका उद्देश्य कैंसर मरीजों के लिए जरूरी न्यूक्लियर मेडिसिन सेवाएं उपलब्ध कराना था। लेकिन प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी के कारण यह अप्रैल 2022 से बंद है। इतना ही नहीं, इसका नियामकीय लाइसेंस फरवरी 2024 में खत्म हो गया और उसका नवीनीकरण भी नहीं कराया गया।
अस्पताल ने क्या कहा?
अदालत के सवाल पर दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट की क्लिनिकल ऑन्कोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. प्रज्ञा शुक्ला ने बताया कि कुछ जरूरी मंजूरियां लंबित होने के कारण मशीन चालू नहीं हो सकी। हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति दोबारा नहीं होनी चाहिए और सरकारी संसाधनों का सही उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

