अधिवक्ता वाणी | कानूनी समाचार
रायपुर, 8 जुलाई। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के उस परिपत्र को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है, जिसमें सरकारी स्कूलों की प्रार्थना सभा में सरस्वती वंदना, गायत्री मंत्र, गुरु मंत्र, दीप मंत्र तथा अन्य प्रार्थनाओं के पाठ का निर्देश दिया गया है।
न्यायमूर्ति अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने कहा कि यह याचिका समय से पूर्व (Premature) दायर की गई है, क्योंकि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सके कि किसी छात्र को इन प्रार्थनाओं का पाठ करने के लिए बाध्य किया गया है या उसके मौलिक अधिकारों का वास्तविक उल्लंघन हुआ है।
हाईकोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां
- परिपत्र में कहीं भी छात्रों को किसी धार्मिक प्रार्थना के लिए अनिवार्य या बाध्य करने का निर्देश नहीं है।
- केवल आशंका के आधार पर संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
- अनुच्छेद 28(1) सरकारी वित्तपोषित विद्यालयों में धार्मिक शिक्षा (Religious Instruction) पर रोक लगाता है, लेकिन नैतिक शिक्षा (Moral Instruction) पर नहीं।
- नैतिक शिक्षा नागरिकता, अनुशासन, सामाजिक समरसता और कानून के प्रति सम्मान विकसित करने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
याचिका में क्या कहा गया था?
पूर्व छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड अध्यक्ष अब्दुल सलाम रिज़वी, पूर्व अल्पसंख्यक आयोग अध्यक्ष महेंद्र छाबड़ा और सामाजिक कार्यकर्ता शफीक अहमद ने याचिका दायर कर कहा था कि:
- परिपत्र में अन्य धर्मों के छात्रों के लिए कोई छूट (Exemption) नहीं दी गई।
- केवल एक धर्म से जुड़े मंत्रों को शामिल करना राज्य की धार्मिक निष्पक्षता के सिद्धांत के विपरीत है।
- इससे छात्रों की धर्म और अंतरात्मा की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि:
- ये मंत्र भारत की सांस्कृतिक विरासत और सार्वभौमिक नैतिक मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- इनका उद्देश्य अनुशासन, कृतज्ञता, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देना है।
- परिपत्र लागू होने के बाद किसी छात्र, अभिभावक या शिक्षक की ओर से कोई शिकायत प्राप्त नहीं हुई।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने याचिका को फिलहाल खारिज करते हुए कहा कि यदि भविष्य में किसी छात्र के मौलिक अधिकारों का वास्तविक उल्लंघन होता है, तो पर्याप्त साक्ष्यों के साथ नई याचिका दायर की जा सकती है।

अधिवक्ता वाणी | कानूनी विश्लेषण
यह निर्णय स्पष्ट करता है कि केवल आशंका के आधार पर संवैधानिक चुनौती स्वीकार नहीं की जा सकती। साथ ही, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि धार्मिक शिक्षा और नैतिक शिक्षा अलग-अलग अवधारणाएं हैं, तथा अनुच्छेद 28(1) केवल धार्मिक शिक्षा पर प्रतिबंध लगाता है, नैतिक शिक्षा पर नहीं।

