दिल्ली उच्च न्यायालय ने मादक पदार्थ रोकथाम अधिनियम (एनडीपीएस) के एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए आरोपी को डिफॉल्ट जमानत प्रदान की है। कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी तय समय-सीमा में जांच पूरी करने में विफल रही। यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का गंभीर उल्लंघन है। न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने स्पष्ट किया कि एनडीपीएस मामलों में जांच अवधि बढ़ाने से पहले आरोपी को नोटिस देना और उसकी शारीरिक या वर्चुअल उपस्थिति सुनिश्चित करना अनिवार्य है। पीठ ने कहा कि यह प्रक्रिया केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि आरोपी को यह जानने का अवसर देने का एक अहम सुरक्षा उपाय है कि उसके खिलाफ क्या कार्रवाई चल रही है और वह उस पर आपत्ति दर्ज करा सके।
यदि आरोपी को न तो सूचित किया जाए और न ही उपस्थित किया जाए, तो ऐसी प्रक्रिया कानूनन अनुचित मानी जाएगी और आरोपी डिफॉल्ट जमानत का हकदार होगा। अदालत ने सत्र अदालत द्वारा जांच अवधि 120 दिन बढ़ाने और डिफॉल्ट जमानत खारिज करने के आदेश को रद्द कर दिया। उच्च न्यायालय ने आरोपी जैवर्धन धवन को बड़ी राहत दी, जिसे मई में अंतरराज्यीय ड्रग तस्करी रैकेट के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। अभियोजन के अनुसार एनसीबी ने जनवरी में 3.6 किलो कोडीन फॉस्फेट टैबलेट जब्त की थीं, जबकि आरोपी ने बरामदगी को फर्जी बताते हुए सैंपलिंग में देरी का भी आरोप लगाया था। यह होती है डिफॉल्ट जमानत डिफॉल्ट जमानत वह वैधानिक अधिकार है, जो आरोपी को तब मिलता है जब पुलिस या जांच एजेंसी कानून में तय समय-सीमा (आमतौर पर 60 या 90 दिन) के भीतर जांच पूरी कर आरोप पत्र दाखिल नहीं कर पाती। ऐसी स्थिति में आरोपी की रिहाई अनिवार्य हो जाती है। इसे वैधानिक या बाध्यकारी जमानत भी कहा जाता है, जो अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करती है।

