इलाहाबाद हाईकोर्ट ने डकैती-हत्या के एक मामले में जमानत अर्जी को खारिज कर दिया। जज ने कहा, यदि सह अभियुक्त को तथ्यों की सही जानकारी नहीं होने के कारण जमानत दे दी गई है तो दूसरे अभियुक्त को समानता के सिद्धांत का पालन करते हुए जमानत नहीं दी जानी चाहिए। इसके साथ ही हाईकोर्ट में बांके बिहारी मंदिर में दर्शन का समय बढ़ाने के खिलाफ अवमानना याचिका दाखिल की गई है।
जमानत याचिका खारिज करने का यह आदेश न्यायमूर्ति संजय कुमार सिंह ने प्रयागराज के वारिस खान की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। कोर्ट ने कहा कि, यदि जमानत देने वाले आदेश में गलत तथ्य शामिल हैं तो कोई जज समानता के आधार पर आरोपी को जमानत देने के लिए बाध्य नहीं है।
यदि कोई अवैधता न्यायालय के संज्ञान में लाई जाती है तो उसे जारी रखने की अनुमति नहीं दी जाएगी। वारिस खान पर प्रयागराज के होलागढ़ थाने में भारतीय दंड संहिता की धारा 396 (डकैती के साथ हत्या), 412 (चोरी की संपत्ति प्राप्त करना) और शस्त्र अधिनियम की धारा 4/25 के तहत मुकदमा दर्ज है।
आरोप है कि शिकायतकर्ता के भाई और उसके बच्चों पर पांच हमलावरों (सारिक, शाहरुख, डाबर, वारिश और फरमान) ने हमला किया और उनकी हत्या कर दी। कोर्ट ने कहा कि इन पांचों हमलावरों को एक साथ गिरफ्तार किया गया था। सभी ने अपराध स्वीकार कर लिया था।
याची ने फरमान के साथ मिलकर अपने हाथ में चाकू होने की बात स्वीकार की थी। याची के वकील का कहना था कि सह अभियुक्त फरमान को हाईकोर्ट से ज़मानत मिल चुकी है। समानता के आधार पर याची को भी जमानत दी जाए। याची 2020 से जेल में है।
अपर शासकीय अधिवक्ता का कहना था कि फरमान को जमानत इस आधार पर दी गई कि तीन साल से चार्जशीट दाखिल नहीं की गई, जबकि चार्जशीट पहले ही दाखिल हो चुकी थी। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दीपक यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसले का संदर्भ देते हुए कहा कि इस मामले में समानता का सिद्धांत लागू नहीं होता, क्योंकि फरमान की ज़मानत भौतिक तथ्यों को छुपाकर प्राप्त की गई। कोर्ट ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए जमानत देने से इंकार कर दिया।
बांके बिहारी मंदिर में दर्शन का समय बढ़ाने के खिलाफ हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दाखिल:
श्री बांके बिहारी जी मंदिर वृंदावन में दर्शन का समय बढ़ाने के निर्णय के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दाखिल की गई है। याचिका मंदिर के कार्यों की निगरानी के लिए गठित हाई पावर कमेटी के 11 सितंबर के निर्णय के खिलाफ ने दाखिल की गई है। गौरव गोस्वामी की ओर से दाखिल याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने न्यायमूर्ति (अवकाश प्राप्त) अशोक कुमार की अध्यक्षता में हाई पावर कमेटी गठित की है, जिसका काम मंदिर के कार्यों की निगरानी करना है।
दर्शन के समय में परिवर्तन का निर्णय हाईकोर्ट द्वारा जनहित याचिका में दिए आदेश की अवमानना है। हाईकोर्ट ने सिविल जज द्वारा दर्शन का समय बढ़ाने के आदेश पर रोक लगा दी थी और इस मामले में अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं आया है। राज्य सरकार ने भी अंडर टेकिंग दी है कि वह मंदिर के काम में हस्तक्षेप नहीं करेगी। इसके बावजूद डीएम और एसएसपी सेवायतों पर दर्शन का समय बढ़ाने का दबाव डाल रहे हैं।

