HIGHCOURT : आवाज का नमूना लेने के लिए आरोपी की सहमति जरूरी नहीं, यह संविधान के अनुच्छेद 20(3) का उल्लंघन नहीं

केरल हाईकोर्ट ने कहा कि, आवाज के नमूने लेने के लिए (तुलना/मिलान के उद्देश्य से) किसी आरोपी की सहमति आवश्यक नहीं है, क्योंकि यह पहले ही स्थापित हो चुका है कि अभियुक्त की आवाज के नमूने प्राप्त करना भारत के संविधान के अनुच्छेद 20 (3) का उल्लंघन नहीं करता।  हाईकोर्ट ने उस याचिका को खारिज…

HIGHCOURT : आवाज का नमूना लेने के लिए आरोपी की सहमति जरूरी नहीं, यह संविधान के अनुच्छेद 20(3) का उल्लंघन नहीं

केरल हाईकोर्ट ने कहा कि, आवाज के नमूने लेने के लिए (तुलना/मिलान के उद्देश्य से) किसी आरोपी की सहमति आवश्यक नहीं है, क्योंकि यह पहले ही स्थापित हो चुका है कि अभियुक्त की आवाज के नमूने प्राप्त करना भारत के संविधान के अनुच्छेद 20 (3) का उल्लंघन नहीं करता। 

हाईकोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया है,जिसमें आरोप लगाया गया था कि आरोपी को उसकी आवाज का नमूना पेश करने का निर्देश देने से पहले सुनवाई का मौका नहीं दिया गया था। 

 जस्टिस आर नारायण पिशारदी ने कहा कि इस मामले में आरोपी के पास विकल्प का कोई अधिकार नहीं है। ”चूंकि एक अदालत द्वारा एक आरोपी को तुलना के उद्देश्य से आवाज का नमूना देने का निर्देश देना संविधान के अनुच्छेद 20 (3) का उल्लंघन नहीं करता है, इसलिए उस उद्देश्य के लिए आरोपी की सहमति की आवश्यकता नहीं है।

 इस मामले में आरोपी के पास विकल्प का कोई अधिकार नहीं है।” याचिकाकर्ता, एक ग्राम पंचायत में एक ओवरसियर है,जो सतर्कता और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (वीएसीबी), त्रिशूर द्वारा दर्ज एक मामले में आरोपी (आरोपी नंबर दो) है। 

मामले के शिकायतकर्ता के बहनोई ने एक नया भवन बनाया था और वह पंचायत से कंप्लीशन सर्टिफिकेट मिलने की प्रतीक्षा कर रहा था। पहले आरोपी, एक ठेकेदार ने शिकायतकर्ता से पैसे मांगे ताकि याचिकाकर्ता (आरोपी नंबर दो) और पंचायत के अन्य अधिकारियों को देकर प्रमाण पत्र देने के लिए राजी किया जा सके। फरवरी 2021 में, पहला आरोपी शिकायतकर्ता से मिला और उससे 25,000 रुपये की राशि ले ली।

 इस प्रकार, पहले आरोपी ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988(पीसी एक्ट) की धारा 7ए रिड विद भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी के तहत दंडनीय अपराध किया। इसी मामले में याचिकाकर्ता को भी आरोपी बनाया गया है। 

मामले की जांच के दौरान इंक्वायरी कमिश्नर और स्पेशल जज (सतर्कता) की कोर्ट ने नोटिस जारी कर याचिकाकर्ता को उसकी आवाज के सैंपल रिकॉर्ड करने के लिए एक स्टूडियो में पेश होने का निर्देश दिया। इस नोटिस को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर नोटिस और उसके आधार पर शुरू की गई आगे की सभी कार्यवाही को रद्द करने की मांग की।

 याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए अधिवक्ता शबू श्रीधरन, मीनू थंपी, अमल स्टेनली, श्याम कुमार एमपी और अनीसा एंड्रयूज ने दो आधारों पर इस नोटिस को चुनौती दीः 

(1) याचिकाकर्ता को आवाज का नमूना देने के लिए मजबूर करने वाला आदेश संविधान के अनुच्छेद 20(3) के तहत गारंटीकृत सरंक्षण का उल्लंघन करता है। 

(2) याचिकाकर्ता को आवाज का नमूना देने का निर्देश देने वाला आदेश विशेष न्यायालय ने उसे सुनवाई का अवसर दिए बिना पारित किया था। 

कोर्ट ने कहा,

 कि ,पहला सवाल मान्य नहीं है क्योंकि रितेश सिन्हा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से स्थापित किया है कि किसी आरोपी को आवाज का नमूना देने का निर्देश आर्टिकल 20 (3) का उल्लंघन नहीं करता है। सुनवाई का अवसर देने के प्रश्न के संबंध में, न्यायालय ने पाया कि ऐसा प्रश्न तभी उठेगा जब नमूना लेने के लिए उसकी सहमति की आवश्यकता होगी।

 चूंकि आवाज का नमूना देने का निर्देश आर्टिकल 20(3) का उल्लंघन नहीं करता है, इसलिए उस उद्देश्य के लिए उसकी सहमति की आवश्यकता नहीं है। जांच अधिकारी के बयान ने खुलासा किया है कि जांच के दौरान जब्त किए गए मोबाइल फोन में याचिकाकर्ता और शिकायतकर्ता के बीच रिश्वत की मांग के बारे में बातचीत का विवरण है। 

यह भी कहा गया कि रिश्वत की मांग को साबित करने के लिए आरोपी और शिकायतकर्ता दोनों की आवाज विश्लेषण आवश्यक है। इसलिए कोर्ट ने पाया कि मामले की प्रभावी जांच के लिए याचिकाकर्ता की आवाज के नमूने लेना बहुत जरूरी है।

 इसके अलावा, कोर्ट ने कहा कि एक जांच एजेंसी को अपराधों को सुलझाने के लिए उन्नत वैज्ञानिक तकनीक और जांच के तरीकों को अपनाना होगा। यह पाते हुए कि नोटिस को चुनौती देना विफल हो गया है, याचिका को तदनुसार खारिज कर दिया गया।

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