चेक बाउंस में कंपनी नहीं, चेक साईनिंग अधिकारी दोषी

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से एक बहुत बड़ी बात सामने आ रही है। चेक बाउंस से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने ताजा फैसले में यह साफ किया है कि यदि किसी संस्था, कंपनी या गैर-सरकारी संगठन ने किसी व्यक्ति को अपनी ओर से चेक जारी करने और भुगतान करने का अधिकार दिया…

चेक बाउंस में कंपनी नहीं, चेक साईनिंग अधिकारी दोषी

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से एक बहुत बड़ी बात सामने आ रही है। चेक बाउंस से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने ताजा फैसले में यह साफ किया है कि यदि किसी संस्था, कंपनी या गैर-सरकारी संगठन ने किसी व्यक्ति को अपनी ओर से चेक जारी करने और भुगतान करने का अधिकार दिया है, तो वह व्यक्ति केवल हस्ताक्षरकर्ता भर नहीं माना जाएगा, बल्कि वह चेक बाउंस यानी चेक के अनादर Dishonour की स्थिति में उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है।

चेक बाउंस से जुड़ा विवाद

यह विवाद तेलंगाना के एक स्वयं सेवी संगठन से जुड़ा था। इस NGO ने वहां की एक जिसने बिजली वितरण कंपनी के साथ एक समझौता किया था।
इस समझौते के तहत स्वयं सेवी संगठन की ओर से भुगतान करने, चेक जारी करने और वित्तीय दायित्व निभाने का अधिकार स्वयं सेवी संगठन ने अपने एक अधिकारी, जो वहां कोषाध्यक्ष के रुप में काम कर रहा था।

स्वयं सेवी संगठन की ओर से इस अधिकारी के दस्तखत से बिजली वितरण कंपनी को एक चेक जारी किया गया था। चेक बाउंस हो गया। नोटिस भेजने के बाद भी बिजली वितरण कंपनी के देनदारी का निबटारा नहीं किया गया।
फलस्वरुप, इसके बाद परक्राम्य लिखत अधिनियम यानी Negotiable Instruments Act की धारा 138 के तहत आपराधिक कार्यवाही शुरू हुई।
आरोपी ने दलील दी कि वह केवल NGO का अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता था और संस्था की ओर से किए गए कार्यों के लिए उसे व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?

मामला जब सुप्रीम कोर्ट में आया तो मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ ने की। शीर्ष अदालत ने कहा कि जब किसी संस्था द्वारा किसी व्यक्ति को अपने फ्रंट फेस के रूप में नियुक्त किया जाता है और उसे चेक साइन करने, जारी करने तथा भुगतान करने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है, तब वह व्यक्ति केवल प्रतिनिधि नहीं रह जाता, बल्कि लेन-देन का वास्तविक जिम्मेदार अधिकारी बन जाता है। अदालत ने कहा कि संबंधित MoU में किसी अन्य पदाधिकारी पर दायित्व नहीं डाला गया था। इसलिए समझौते से उत्पन्न सभी अधिकारों और दायित्वों का निर्वहन उसी व्यक्ति द्वारा किया जाना था, जिसे हस्ताक्षर और भुगतान का अधिकार दिया गया था। ऐसे में चेक बाउंस होने पर वही व्यक्ति जवाबदेह होगा। आखिर में अदालत ने NGO के कोषाध्यक्ष की सजा को बरकरार रखते हुए कहा कि संगठन ने उसे सभी वित्तीय लेन-देन और चेक जारी करने के लिए अधिकृत किया था, इसलिए चेक बाउंस होने के परिणामों के लिए वही जिम्मेदार होगा।

फैसले का असर

शीर्ष अदालत का फैसला देश की कंपनियों, सोसायटियों, ट्रस्टों और NGO पदाधिकारियों के लिए एक बड़ा मैसेज है। यदि किसी व्यक्ति को संगठन की ओर से वित्तीय निर्णय लेने, चेक जारी करने और भुगतान करने की जिम्मेदारी दी जाती है, तो वह बाद में केवल “अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता” होने का बचाव नहीं ले सकता। दूसरी ओर, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि केवल किसी पद पर बैठे व्यक्ति को बिना उसकी भूमिका और जिम्मेदारी साबित किए आरोपी नहीं बनाया जा सकता। यह निर्णय धारा 138 और धारा 141 एनआई एक्ट की व्याख्या को और स्पष्ट करता है तथा चेक बाउंस मामलों में जवाबदेही तय करने के लिए महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।

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