जस्टिस कृष्ण मुरारी का विदाई समारोह : 3 साल के कार्यकाल में 60 से ज्यादा फैसले सुनाए

 शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस कृष्णा मुरारी का आखिरी कार्य दिवस था। जस्टिस कृष्णा मुरारी 2019 में सुप्रीम कोर्ट जज बनाए गए थे। साढ़े 3 साल के कार्यकाल में उन्होंने 60 से ज्यादा फैसले सुनाए। 8 जुलाई 2023 को वे रिटायर हो रहे हैं। उन्हें सितंबर 2019 में इलाहाबाद हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट में…

जस्टिस कृष्ण मुरारी का विदाई समारोह : 3 साल के कार्यकाल में 60 से ज्यादा फैसले सुनाए

 शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस कृष्णा मुरारी का आखिरी कार्य दिवस था। जस्टिस कृष्णा मुरारी 2019 में सुप्रीम कोर्ट जज बनाए गए थे। साढ़े 3 साल के कार्यकाल में उन्होंने 60 से ज्यादा फैसले सुनाए। 8 जुलाई 2023 को वे रिटायर हो रहे हैं। उन्हें सितंबर 2019 में इलाहाबाद हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट में प्रमोट किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट में उनकी विदाई पर सेरेमोनियल बेंच बैठी, जहां CJI चंद्रचूड़ से लेकर वहां मौजूद सभी वकीलों ने अपनी बात रखी। एक वकील ने क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी से तुलना करते हुए कहा कि जस्टिस मुरारी महेंद्र सिंह धोनी की तरह थे। वह हमेशा बहुत शांत रहते थे और उनके कोर्ट रूम में कोई दबाव नहीं था।

इस पर सॉलिसिटर जनरल मेहता ने कहा- मैं इस बात से सहमत नहीं, क्योंकि धोनी की कूलनेस मैदान पर थी, लेकिन जस्टिस मुरारी में इनबिल्ट है।

जस्टिस कृष्णा मुरारी के रिटायरमेंट पर कौन क्या बोला…

CJI चंद्रचूड़ ने कहा- जस्टिस मुरारी बहुत शांत स्वभाव के हैं। उन्होंने कभी तेज आवाज में बात नहीं की। वे वाकई सुप्रीम कोर्ट के एक लोकप्रिय सदस्य रहे।

वरिष्ठ वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने कहा- जस्टिस मुरारी शांत स्वभाव के हैं। खास तौर पर वैवाहिक मामलों में उन्होंने सुलह का लक्ष्य रखा। हम उसे हमेशा याद रखेंगे।

अटॉर्नी जनरल ने कहा- वे पूरे देश के बारे में सोचते थे। उनके फैसले हाईक्लास थे। मो. शाबिर का फैसला विकलांगता से पीड़ित लोगों के साथ होने वाले भेदभाव के लिए मिसाल था।

जस्टिस कृष्णा मुरारी बोले-अलविदा कहना भारी है

जस्टिस कृष्णा मुरारी ने अपने विदाई भाषण में कहा- इस कोर्ट में आना शानदार अनुभव रहा है। आज बोलना वाकई कठिन है। मैं बहुत ही साधारण पृष्ठभूमि से हूं, जो इस पेशे में पहली बार आया था। मैं खुद को भाग्यशाली मानता हूं कि CJI मेरे साथ दो बार रहे, एक बार इलाहाबाद में और एक बार यहां।

यह बात कि मैं सुप्रीम कोर्ट के गलियारों में नहीं चल पाऊंगा, थोड़ा निराशाजनक है, क्योंकि मैं यहां चार दशकों से चल रहा हूं, लेकिन जो कुछ भी शुरू होता है उसका अंत होता है। आज जब मैं ऑफिस छोड़ रहा हूं, जहां 4 दशकों में से लगभग 19 साल मैंने बेंच पर बिताए हैं। उसे अलविदा कहना भारी लगता है।

मैं एक शेर के साथ अपनी बात खत्म करूंगा कि- “हमारे बाद अब महफिल में अफसाने बयां होंगे बहारें हम को ढूंढेगी, ना जाने हम कहां होंगे।”

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