सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को व्यवस्था दी है कि राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण अधिनियम, 1956 के तहत अधिग्रहित की गई जमीन के बदले भूमि मालिकों को मुआवजे के बंटवारे से जुड़े विवाद पर DM नहीं जिला जज फैसला करेंगे। इन विवादों को जिला न्यायाधीश की अदालत में भेजा जाएगा न कि जिलाधिकारी के पास।
जस्टिस BR गवई और जस्टिस JB पारदीवाला की पीठ ने कहा, मुआवजे की निर्धारित राशि के बंटवारे से जुड़े विवाद को हल करने का काम प्रधान सिविल न्यायालय ही कर सकता है। प्रधान सिविल न्यायालय का मतलब जिला न्यायाधीश का न्यायालय है। सुप्रीम कोर्ट ने 28 फरवरी, 2020 के इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ के आदेश के खिलाफ विनोद कुमार और अन्य की अपील को स्वीकार कर लिया।
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने एकलपीठ के उस फैसले के खिलाफ दाखिल अपील खारिज कर दी थी कि जिसमें कहा गया था कि जिलाधिकारी की राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण अधिनियम, 1956 की धारा 3जी(5) के तहत विशेष भूमि अधिग्रहण अधिकारी द्वारा पारित किए आदेश की वैधता को जांच कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट उत्तर प्रदेश के मऊ जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 29 को चार लेन बनाने के लिए अधिग्रहित भूमि के टुकड़े के लिए अपीलकर्ताओं के बीच मुआवजे की राशि के बंटवारे से जुड़े मामले में सुनवाई कर रहा है। 1956 अधिनियम के प्रावधानों का गौर करने के बाद पीठ ने कहा, हम यह समझने में असफल हैं कि हाईकोर्ट ने अपने आदेश में किस आधार पर कहा है कि जिलाधिकारी विशेष भूमि अधिग्रहण अधिकारी की ओर से दी गई राशि के बंटवारे को लेकर विवाद पर दिए आदेश की जांच करने और निर्णय लेने के लिए सक्षम है।

