पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने शुक्रवार को एक बेहद संवेदनशील मामले में तीखी टिप्पणी करते हुए फिरोजपुर के कुलगढ़ी थाना क्षेत्र में गिरफ्तार किए गए गुरप्रीत सिंह सेखों की रिहाई के तत्काल निर्देश जारी किए।
कोर्ट ने साफ कहा कि अगर जमानत की प्रक्रिया में बाधा डालकर किसी नागरिक की स्वतंत्रता छीनी गई है, तो यह सीधे-सीधे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई तय है।
मामला गुरप्रीत सिंह की मां कुलबीर कौर सेखों द्वारा दायर हैबियस कॉर्पस याचिका से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि उनके बेटे को गांव के सरपंच मंदीप सिंह जो कथित तौर पर सत्ताधारी दल से जुड़े हैं की राजनीतिक रंजिश में फंसाकर अवैध रूप से पकड़ा गया और बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया के जेल भेज दिया गया।
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि 12 दिसंबर को बीएनएसएस की धारा 126/170 के तहत दर्ज किए गए कलंदरे के बाद एसडीएम फिरोजपुर ने एक बेहद चौंकाने वाला आदेश पारित करते हुए यह टिप्पणी कर दी कि “विपक्षी पक्ष ने कोई जमानत बांड प्रस्तुत नहीं किया।” इसके आधार पर गुरप्रीत सिंह को सीधे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। जबकि उनके वकील अरशदीप सिंह रंधावा उसी समय एसडीएम दफ्तर के बाहर मौजूद थे लेकिन उन्हें अंदर जाने नहीं दिया गया। याचिकाकर्ता ने इसे सत्ता पक्ष की दबंगई और प्रशासन की मिलीभगत बताया।
हाईकोर्ट ने दस्तावेज़ों का अवलोकन करने के बाद प्रारंभिक तौर पर माना कि मामले में राजनीतिक प्रभाव का शक स्पष्ट रूप से झलकता है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि सरपंच मंदीप सिंह द्वारा पहले कभी गुरप्रीत के खिलाफ कोई शिकायत दाखिल नहीं की गई थी, लेकिन जैसे ही अदालत ने 8 दिसंबर को याचिकाकर्ता के पक्ष में आदेश दिया, तुरंत उसके बाद कलंदरा दर्ज करना गंभीर सवाल खड़े करता है। न्यायपालिका ने इसे प्रशासनिक मनमानी करार देते हुए कहा कि किसी भी सूरत में नागरिक की स्वतंत्रता से ऐसा खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
जस्टिस संजय वशिष्ठ ने तत्काल प्रभाव से आदेश पारित करते हुए उपायुक्त–कम–जिलाधीश फिरोजपुर को निर्देश दिया कि वह आज ही जमानत की पूरी प्रक्रिया सुनिश्चित करें। अदालत ने साफ किया कि यदि एसडीएम उपलब्ध न हों तो यह जिम्मेदारी उपायुक्त स्वयं या संबंधित एसएचओ निभाएंगे। ज़मानत प्रक्रिया पूरी होने के बाद गुरप्रीत सिंह को उसी समय रिहा किया जाए, अन्यथा यह अदालत की नजर में गंभीर संवैधानिक उल्लंघन माना जाएगा और दोषी अधिकारी कार्रवाई झेलने के लिए तैयार रहें। मामला अब 17 दिसंबर को फिर से हाईकोर्ट की अर्जेंट सूची में सुना जाएगा।

