इलाहाबाद हाईकोर्ट में अधिवक्ता के सम्मान का मुद्दा गरमाया, बार एसोसिएशन ने मुख्य न्यायमूर्ति को लिखा पत्र
न्यायमूर्ति अजय भनोट के न्यायालय में कथित दुर्व्यवहार का आरोप, उचित कार्रवाई नहीं होने पर कोर्ट बहिष्कार की चेतावनी
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट में अधिवक्ता के सम्मान और गरिमा को लेकर विवाद सामने आया है। हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, इलाहाबाद ने 27 अक्टूबर 2026 को मुख्य न्यायमूर्ति को पत्र लिखकर न्यायालय कक्ष संख्या 49 में हुई कथित घटना पर गंभीर आपत्ति जताई है। एसोसिएशन ने मामले में उचित कार्रवाई की मांग की है।
बार एसोसिएशन के पत्र के अनुसार, न्यायालय कक्ष संख्या 49 में न्यायमूर्ति अजय भनोट की उपस्थिति के दौरान एक जनपद के पुलिस अधीक्षक, अपर महाधिवक्ता (Ld. AGA) के पीछे वाली पंक्ति में बैठे थे। पत्र में आरोप लगाया गया है कि एक अधिवक्ता ने सम्मानपूर्वक पुलिस अधीक्षक से पीछे बैठने का अनुरोध किया और कहा कि वह सीट उनकी नहीं है।
पत्र के मुताबिक, इस पर अपर महाधिवक्ता ने अधिवक्ता को फटकार लगाई और न्यायमूर्ति के समक्ष शिकायत करने की बात कही। इसके बाद, बार एसोसिएशन ने आरोप लगाया कि न्यायमूर्ति ने अधिवक्ता की ओर उंगली उठाते हुए कठोर शब्दों का इस्तेमाल किया और उन्हें जेल भेजने का आदेश पारित किया।
एसोसिएशन ने अपने पत्र में यह भी आरोप लगाया है कि घटना के दौरान अधिवक्ता से पुलिस अधीक्षक से माफी मांगने को कहा गया। पत्र में वरिष्ठ अधिवक्ता बी.पी. श्रीवास्तव के प्रति कथित अपमानजनक व्यवहार का भी उल्लेख किया गया है।
मुख्य न्यायमूर्ति से कार्रवाई की मांग
हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. सी.पी. उपाध्याय और महासचिव संतोष कुमार मिश्रा की ओर से भेजे गए पत्र में कहा गया है कि इस घटना से अधिवक्ताओं के सम्मान और गरिमा को ठेस पहुंची है।
एसोसिएशन ने मुख्य न्यायमूर्ति से मामले का गंभीरता से संज्ञान लेकर उचित कार्रवाई करने का अनुरोध किया है। पत्र में चेतावनी दी गई है कि यदि उचित कार्रवाई नहीं की गई, तो हाईकोर्ट बार एसोसिएशन न्यायमूर्ति अजय भनोट की अदालत का बहिष्कार करने पर विचार करेगा।
पत्र में यह भी कहा गया है कि अधिवक्ताओं के सम्मान की रक्षा आवश्यक है और न्यायालय में किसी भी पक्ष की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली स्थिति को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
नोट: यह खबर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के दिनांक 27 अक्टूबर 2026 के पत्र में लगाए गए आरोपों पर आधारित है। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि तथा संबंधित न्यायमूर्ति, अपर महाधिवक्ता या पुलिस अधिकारी का पक्ष इस दस्तावेज में उपलब्ध नहीं है।
