- जिस व्यवस्था के तहत सुप्रीम कोर्ट में नियुक्तियां की जातीं हैं उसे “कॉलेजियम सिस्टम” कहा जाता है। इसके अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट के मुख्यन्यायाधीश के नेतृत्व में बनी वरिष्ठ जजों की समिति जजों के नाम तथा नियुक्ति का फैसला करती है।
- सुप्रीम कोर्ट तथा हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति तथा तबादलों का फैसला भी कॉलेजियम ही करता है।
- हाईकोर्ट के कौन से जज पदोन्नत होकर सुप्रीम कोर्ट जाएंगे यह फैसला भी कॉलेजियम ही करता है।
- कॉलेजियम व्यवस्था का भारत के संविधान में कोई जिक्र नही है। इसका उल्लेख न तो मूल संविधान में है और न ही उसके किसी संशोधन प्रावधान में।
28 अक्टूबर 1998 को 3 जजों के मामले में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के जरिए प्रभाव में आए कॉलेजियम सिस्टम के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस और सुप्रीम कोर्ट के 4 वरिष्ठ जजों का एक फोरम जजों की नियुक्ति और तबादले की सिफारिश करता है। कॉलेजियम की सिफारिश दूसरी बार भेजने पर सरकार के लिए मानना जरूरी होता है। कॉलेजियम की स्थापना सुप्रीम कोर्ट के 5 सबसे सीनियर जजों से मिलकर की जाती है ।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने गुवाहाटी उच्च न्यायालय के अतिरिक्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनीष चौधरी को उस उच्च न्यायालय का स्थायी न्यायाधीश नियुक्त करने का प्रस्ताव रखा है। कॉलेजियम ने जस्टिस संजय कुमार मेधी और जस्टिस नानी तागिया को भी कुछ समय पहले स्थायी जज बनाने का प्रस्ताव रखा था।
(NJAC) राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग
को सुको ने 2015 में दिया था असंवैधानिक करार
विदित हो कि कॉलेजियम व्यवस्था को बदलने हेतु वर्ष 2015 में UPA सरकार ने 15 अगस्त 2014 को कॉलेजियम सिस्टम की जगह (National Judicial Appointments Commission) राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग का गठन किया था , लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 16 अक्टूबर 2015 को राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) कानून को असंवैधानिक करार दे दिया था। इस प्रकार वर्तमान में भी जजों की नियुक्ति और तबादलों का निर्णय सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम सिस्टम ही करता है।

